Tuesday, September 18, 2007

किस्मत

आँखों की किस्मत मे न था वो नजारा ,
तुम ही क्या कोई भी न रहा हमारा ,
दिखाई नही देती कोई रोशनी भी अब तो ,
हुए अशियानो का हर तरफ़ है नजारा ,
सुनाने को तैयार नही फरियाद हमारी ,
वो हर किसा का खुदा भी न रहा हमारा ,
सोचते थे जिसकी बाँहों मे गुजर जाए ये जिन्दगी ,
पर बेवफा निकला हमसफ़र हमारा

दिव्या

Monday, September 17, 2007

उसकी बेवफाई

उसकी बेवफाई
हो जाए बर्बाद इस दुनिया से खुदाई,
हर इन्सां के नसीब मे हो सिर्फ़ तनहाई,
दर्द ही रहे दमन मे हर किसीके,
ना गूंजे कहीँ भी शहनाई,
उजड़ जाए आशियाने ने परिंदों के,
चले कोई ऐसी पुरवाई,
ना रहें हम ना रहें वो,
हो जाए जीने मे इतनी रुसवाई,
गरीब ना हो कर भी मोहोब्बत के भूखे रहे हम,
किसी बेवफा ने की ऐसी बेवफाई

दिव्या