तुम ही क्या कोई भी न रहा हमारा ,
दिखाई नही देती कोई रोशनी भी अब तो ,
हुए अशियानो का हर तरफ़ है नजारा ,
सुनाने को तैयार नही फरियाद हमारी ,
वो हर किसा का खुदा भी न रहा हमारा ,
सोचते थे जिसकी बाँहों मे गुजर जाए ये जिन्दगी ,
पर बेवफा निकला हमसफ़र हमारा
दिव्या
3 comments:
y u so sad
wah wah wah
kya baat hai
Nice poem Divya. I would like to see the poem you recited when we called on you for Dinner.
Looking forward for that..
See ya..
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