Sunday, January 3, 2010

faasale

फासले कुछ ऐसे हुए की हम तुम क्या से क्या हो गए,
कुछ ऐसे की फूल समय से पहले ही मुरझा गए,
आँखों से बरसात बिना सावन ही आ गई,
हमारी दुनिया ही जैसे वीरान होती गई,
कोशिसे नाकाम होती गई, जुन्दगी शमशान होती गई,
तेरे आने और जाने में एक अरसा लगा,
तेरे आने की उम्मीद ने मुझे बंधे रखा.
सबर का बांध जर्जर होता गया, जैसे मेरी रूह को कोई लेता गया.
अस्तित्व को तरसती मेरे रिश्ते की डोर, आज भी लगता है क्यों तू हर ओर.
नहीं चाहती की वापस आ जाये तू, पर आज भी मेरा दिल तुझे चाहता है क्यों?
सवालों के सिलसिले में, किसी का भी जवाब नहीं मेरे पास,
नहीं समझ पति की ना होते हुए भी क्यों है तू इनता खास?

2 comments:

gyaneshwaari singh said...

kayee bara ham jo chahate hai wo nahi hota hai to ham har sawaal ka ans chahate hai ki wo ku nahi hua...aur kai swaal bas swaal rah jate hai

Divya said...

very nice thanks for your comment