maa ganga
माँ गंगा
उसका महान रूप और अखंडता ,
निश्छल सौम्यता ,अतुलित शीतलता.
प्रेम की धरा सी निरंतित बहाना ,
कष्टों से परिपुरण मायानगरी सी धरती ,
उसे भी निस्वार्थ हंसते हुये सहना .
परिपूरन है परिमार्जित है ,
सृस्ठी के माथे पर अलंकृत है .
अभी भी अविजित अविक्रित रूप से बहती जा रही है ,
शंकर की जाता से निकली गंगा हूँ मैं यही समझा रही है .
जय माँ
उसका महान रूप और अखंडता ,
निश्छल सौम्यता ,अतुलित शीतलता.
प्रेम की धरा सी निरंतित बहाना ,
कष्टों से परिपुरण मायानगरी सी धरती ,
उसे भी निस्वार्थ हंसते हुये सहना .
परिपूरन है परिमार्जित है ,
सृस्ठी के माथे पर अलंकृत है .
अभी भी अविजित अविक्रित रूप से बहती जा रही है ,
शंकर की जाता से निकली गंगा हूँ मैं यही समझा रही है .
जय माँ
3 comments:
I was waiting for this. Really Appreciate the poem . Good Luck.
Hi,
I was waiting for this one, Very nice...Keep posting.
Good Luck.
CP
gr8
liked it very true
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